Sunday, 17 January 2016

जनूँ मेरा या राह की दीवार !!!


यह घटना भी देहरादून में ही घटित हुई। देहरादून से कोई 7-8 किमी दूर प्रेमनगर में!

 जैसा कि मैं पहले एक घटना में बता चुका हूँ कि उस क्षेत्र में द्वितीय विश्वयुद्ध के समय युद्धबंदियों को रखने के लिए बैरकेँ बनाई गई थी, जिन्हें बाद में विभाजन के समय आये शरणार्थीयों को अलाट कर दिया गया।


1939 के उस युद्ध के समय, इस तरफ घने जंगल थे। बरसातें भी बहुत होती थी, और सर्दी भी बहुत पड़ती थी। जिसके कारण वातावरण में हर समय एक नमी सी रहती थी। जिस कारण भिन्न भिन्न प्रकार के कीट-पतंगे तथा अन्य सूक्ष्म जीव इस भाग में सहज ही पनपते थे, जो शुष्क मैदानी क्षेत्रों में नही पाए जाते थे !



भले ही इन कैदियों का नाम युद्धबन्दी हों पर कैदी तो आखिरकार कैदी ही होता है। उस समय तक जिनेवा कन्वेंशन जैसी कोई चीज़ भी अस्तित्व में नहीं थी, जिससे उनके मानवाधिकार की किसी को कोई चिंता होती।

सूचनाएँ प्राप्त करने के लिए उन्हें बर्बर तरीकों से तकलीफें दी जाती थी, कई बार तो अमानवीय क्रूरता तक, जिस वजह से कई युद्धबन्दी तड़प और दर्द की वेदना सह न सकने के कारण मर भी जाते थे। ऐसे मृतकों को यूँ हीं खुर्दबुर्द कर दिया जाता था।



प्रत्येक विंग में कैदियों को रखने वाली इन्ही बैरकों के आखिरी सिरों पर एक विशाल बैरक होती थी, जिसे एडमिनिस्ट्रेटिव कार्यों के लिए इस्तेमाल किया जाता था। तथा सरकारी स्टाफ भी इन्ही जगहों पर ही बैठता था।

आजादी के बाद, आम जनो को तो पाकिस्तान में छूट चुकी उनकी जगहों के बदले कैदियों वाली यह साधारण बैरकेँ अलाट की गई, परन्तु जो सरकारी अफसर और बड़े जमींदार थे उन्हें यह एडमिंस्ट्रेशन वाली बड़ी बैरकेँ मिल गईं।

जिस विंग में हम रहते थे, उसमे भी ऐसी ही एक बड़ी बैरक थी, जिसमे बैरक के आगे बहुत खुला लान था, जिसे चारदीवारी कर उस बैरक का हिस्सा ही बना दिया गया था, पर देखभाल न होने की वजह से उजाड़ अवस्था में था।

बैरक चारो तरफ ऊँची चारदीवारी से घिरी थी, और एक तरफ बड़ा सा काला गेट था। गेट और दीवार के बीच जो थोड़ी सी जगह छूट जाती है, वहाँ से आँख लगा देखने पर वो बैरक सदा बन्द सी ही नज़र आती थी। कई सालों से कोई बाहर का व्यक्ति कभी अंदर जाते अथवा अंदर का कोई व्यक्ति बाहर आते किसी ने नही देखा था और न ही उस बैरक में रहने वालों ने किसी से कभी मिलने जुलने का कोई प्रयास किया था।

सालों से मरम्मत न होने के कारण, बैरक भी अब बगीचे की ही तरह उजाड़ दिखाई देने लगी थी, हालाँकि पहले कभी वो अच्छी अवस्था में रही होगी, जैसे कि उसके साथ कि अन्य बैरकेँ थी।

बस कभी कभार उस बैरक का गेट खुलता था, एक काले रंग की अम्बेसडर गाडी में एक व्यक्ति जिसे लोग सुक्खा नाम से जानते थे, बाहर जाता था, और लोकल मार्किट से नही बल्कि देहरादून शहर की मार्किट से अपनी जरूरतों का सामान ले फिर अपनी दुनिया में बन्द हो जाता था।

सालों से बिजली पानी के बिल औसत के हिसाब से आ रहे थे क्यूँकि न तो कभी रीडरों की हिम्मत, न तो मीटर से रीडिंग लेने की होती थी और न ही उस घर का कनेक्शन काटने की ! बस, वो लैटर बॉक्स में ही बिल डाल कर चले जाते थे। वो कभी जमा करवाया जाता था या नही, इसके बारे में न तो कोई जानता था और न ही किसी से पूछने की कभी कोई हिम्मत कर पाया !

कई बार, ऐसा हुआ कि खेलते हुए जब कभी हम लोगों की गेंद उस चारदीवारी के भीतर चली जाती थी, तो अधिकतर हम उसे दुबारा पाने का ख्याल छोड़ ही देते थे। पर जब कभी सुक्खा घर पर न हो, एकाध हिम्मती बच्चे ने दीवार फाँद अंदर कूदने की हिम्मत की, और जल्दी ही कई सारी पुरानी गेंदे भी साथ ही उठा लाया।

पर साधारण स्थिति में तो कभी भी हिम्मत नही हुई किसी की । एक अज़ीब सी रहस्यमय इमेज थी उस घर की।

रात को अक्सर बाँसुरी बजने की आवाज आती थी, और कई बार कुछ चीजें भी गिरने की!

 पुराने लोग बताते थे कि यह बैरक उस समय के एक थानेदार को मिली थी। थानेदार बहुत ही रुआब वाला व्यक्ति था, पर इस बैरक में आने के बाद से उसके साथ कुछ ठीक नहीं चल रहा था।



यहाँ आने के कुछ समय बाद से ही उसकी पत्नी बीमार रहने लगी। कुछ अज़ीब अज़ीब सी हरकतें करती, कभी सोते-सोते यूँ अचानक रात किसी प्रहर चौंक कर उठ जाना, कभी रोने लगना, कभी हँसने लगना, कभी बेवजह ही बाथरूम जाकर नहाना शुरू कर देना। कई बार यूँ हीं नलकों को खुला छोड़ देना !

थानेदार की ड्यूटी उस समय बदायूँ में थी, उसे समाचार मिला तो छुट्टी ले कर आया। घर का हाल बेहाल था, तीनो बच्चे डरे हुए थे। कई डाक्टरों से इलाज करवाया, कोई लाभ नही हुआ। झाड़ फूँक वालों को भी बुलवाया, पर हालात जस के तस !

पँजाबी समुदाय था, अखण्ड पाठ करवाया घर की शान्ति के लिए। छुट्टियां समाप्त हुई तो फिर उसे ड्यूटी पर जाना पड़ा !

अभी बमुश्किल वो अपने थाने पहुँचा ही था कि वहाँ एक खौफनाक खबर उसका इंतज़ार कर रही थी, उसके घर से आने के बाद ही उसकी पत्नी ने पंखे से लटक ख़ुदकुशी कर ली थी।

अब बहुत विकट समस्या आन पड़ी थी, कई सौ किमी दूर ड्यूटी करे या फिर इधर रुक बच्चों की देखभाल !

दूर की एक रिश्तेदार वृद्ध औरत को कुछ पैसों में पक्का कर, और साथ ही घरेलू कार्यों के लिए एक नौकर लगा वो अपने साथ अपना सबसे छोटा बेटा ले गया और एक बेटे और बेटी को वहीँ छोड़ गया।

घर से अच्छी खबरें नही थीं, कभी वृद्ध औरत छोड़ जाती थी तो कभी नौकर। बच्चों का व्यवहार भी असामान्य हो चला था। अपनी नौकरी के बूते उसे लाभ था कि उसके यहाँ के  सम्पर्क एक नौकर के जाते ही तुरन्त दूसरा लगवा देते थे, कई लाचार या बेसहारा औरत मिले तो उसे भी बच्चों की देखभाल की व्यवस्था में नियुक्त कर देते थे। पर कोई टिक नही पा रहा था।

थानेदार अपनी नौकरी में भी परेशान था। अंग्रेज बहादुर का समय जा चुका था, उसने उस समय में अपनी नौकरी की शुरुआत की थी, जब एक थानेदार का भी अपना अलग ही जलवा होता था। बड़े बड़े अमीर उमराव सलाम ठोकते थे। परन्तु, अब लोकतन्त्र आ गया था, जिन्हें पकड़ पकड़ कर जेलों में भर देते थे, आज वही सरकार थे। अनुभव नही था, परन्तु पूरे सिस्टम को अपने अधीन करने की छटपटाहट थी। जरा सी कोई बात होते ही ट्रान्सफर या निलम्बन आम बात हो गई थी। अब तो चोर उचक्के भी सामने से ही कन्नी काट जाते थे, या फिर सिफारिश ले आते थे !

पत्नी की मृत्यु के बाद के दो से तीन सालों के भीतर ही थानेदार साहब का चार से पाँच बार स्थानांतरण हो गया था। वो अपनी तरफ से प्रयास करते थे कि अपनी तरफ ही हो जाये जिससे बच्चों का भी ध्यान रह पाये, पर शायद उनकी किस्मत में पूर्वी उत्तर प्रदेश ही बदा था। फिलहाल वो बरेली में थे। पर इस सब सिलसिले में उनके छोटे पुत्र सुक्खे की पढ़ाई चौपट हो चुकी थी।

स्कूल न जा, वो यहाँ तहाँ घूमता रहता था। थानेदार का पुत्र होने की वजह से मास्टरों की भी हिम्मत नही होती थी कि कुछ कह सकें। छोटी उम्र से ही नशा और शराब, दोनों से ही नाता जुड़ चुका था। धीरे धीरे उसकी संगत कुछ ऐसे लोगों की होने लगी, जो अघोड़ी यानि तन्त्र मन्त्र की साधना करते थे। अब उसका अधिकतर समय ऐसे लोगों में ही बीतने लगा।

बरेली, मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र होने के कारण, इस तरह की बातों के लिए कुछ अधिक ही प्रसिद्ध था। अनेक ऐसे फनों के उस्ताद थे, जो रूहानी शक्तिओं और जिन्न्न-जिन्नात को काबू में रखने के दावे रखते थे। इस तरफ आकर्षण हो जाने की वजह से सुक्खा अब कभी तांत्रिको की संगत में बैठा मिलता था तो कभी, ऐसे मुल्लाओं के !



सुक्खे की गतिविधियों की जानकारी, थानेदार साहब को न हो, ऐसा नही था। परन्तु सर्वथा इन नए क्षेत्रों में अपनी पकड़ बनाने की जद्दोजहद, नए शासकों से सामन्जस्य बनाने की जी तोड़ कोशिश, और फिर ऊपर से लगातार घर से आती निराशाजनक खबरों के बीच वो कभी सुक्खे की तरफ न ध्यान दे पाये और न ही उसे रोक पाये ।

और फिर एक दिन, उन्हें खबर मिली कि उनके बड़े बेटे की रहस्यमय परिस्थितियों में मृत्यु हो गई है।

पहले पत्नी की मृत्यु और अब पुत्र की.... थानेदार मानसिक रूप से टूट गया।

नौकरी मे भी अब जी हजूरी ही करनी पड़ रही थी, और इधर सुक्खे की तरफ भी उसका ध्यान गया तो उसकी चिंता और भी बड़ गई। रात रात भर वो घर से गायब रहता था, अज़ीब से लोग उसके मित्र बने हुए थे। आँखें हरदम लाल सुर्ख़ रहती थी, और वो अपनी ही किसी दुनिया में खोया रहता था। यदि उससे कभी थानेदार ने एक पिता की तरह बात करने का प्रयास भी किया तो उसकी बातें घूम फिर कर मौत और परालौकिक घटनाओं पर ही आ जाती थी।

इस चिंताग्रस्त स्थिति में थानेदार ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों को विश्वास में लिया और एक लम्बी छुट्टी का आवेदन दे, किसी तरह सुक्खे को ले देहरादून आ गया।

दौ मौतों के पश्चात घर मरघट सा वीरान था। बेटी की हालत भी बेहद खराब थी, शरीर सूख कर काँटा हो चुका था, आँखे भीतर तक गहरी धँस चुकी थी। स्कूल जाना उसने बन्द कर दिया था, बस पूरा दिन अपने कमरे के भीतर ही बन्द रहती थी। यदि कोई बात करने का प्रयास भी करे तो केवल हाँ-हूँ में जवाब दे चुप हो जाती थी।

घर की व्यवस्था के लिए जो औरत और नौकर वहाँ थे, वो भी इस अजीबोगरीब परिस्थितियों से घबराये हुए थे। यदि उनके ऊपर इतने बड़े लोगों का दबाव न होता तो वो भी शायद अभी तक भाग खड़े हुए होते।

थानेदार ने स्वयं को अपने ही घर में बेहद बेबस और लाचार पाया, परन्तु आश्चर्यजनक रूप से सुक्खा बेहद प्रसन्न था। बन्द तो वह भी अपने कमरे में घन्टो रहता था, पर उसे यहाँ आकर कोई शिकायत नही थी, जैसा कि थानेदार को उसकी तरफ से प्रतिरोध की आशँका थी।

इन्ही सब हालातों में कुछ समय और गुजरता गया, थानेदार ने अपनी छुट्टीयाँ बढ़वाते बढ़वाते आखिर एक दिन नौकरी से त्यागपत्र दे दिया क्यूँकि अब उसकी तबियत भी ठीक नही रहती थी। सुबह उठता तो पूरा शरीर जैसे जकड़ा सा होता था, घण्टे भर बाद यदि हाथ पैर खुलते भी थे तो गर्दन के पास तेज दर्द महसूस होता रहता था दिन भर! महीनों से वह ढंग की नींद नही ले पाया था, रात भर अजीबोगरीब सपने आते थे। अनावश्यक रूप से अब वह भी किसी से मिलने पर मौत की चर्चा करता रहता था !



एक दिन खाने की मेज़ पर सुक्खे से बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ। बातचीत लम्बी खिंच गई, घर की साधारण बातों से शुरू हो मौत की तरफ चल पड़ी। सुक्खे ने रहस्योद्घाटन किया कि यह घर जिन्नात के कब्ज़े में है। यह आत्माएँ उन सैनिकों की हैं, जिन्हें युद्धबंदियों के तौर पर असहनीय यातनाएं दे कर इस घर के आँगन में गाड़ दिया गया था। अब इतने समय में इधर उधर की कुछ दूसरी आत्माएँ भी इनके साथ आ कर मिल चुकी हैं। इनकी संख्या इतनी हो चुकी है कि अब कोई बड़े से बड़ा पीर औलिया भी इन्हें इस जगह से हटा नही सकता। हाँ, इनके साथ दोस्ती की जा सकती है, और सुक्खा आजकल इसी प्रयास मे लगा हुआ है। उसने यह भी बताया कि कुछ ही दिनों में उसकी बहन भी मरने वाली है, तथा उसके बाद उसके पिता का ही नम्बर है। यह निश्चित हो चुका है और इसको अब बदला नहीं जा सकता ! रूहों का विश्वास जीतने के लिए, वह उनकी योजनाओं मे कोई रुकावट नहीं डालेगा, हाँ इतना वादा कर दिया कि वह प्रयास करेगा कि उन दोनों की मौत तकलीफदेह न हो।

यह सब सुन थानेदार का पूरा शरीर सुन्न हो गया, घबराहट के मारे चेहरा सफेद फक् हो गया, जैसे किसी ने शरीर में से रक्त की आखिरी बूँद भी निकाल ली हो। हाथ पाँव डर के मारे कम्पकम्पाने लगे। परन्तु सुक्खे का चेहरा सपाट और भावविहीन था, उसकी आँखे शून्य में एकटक लगी हुई थीं।

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समय कुछ और बीत चुका था। इस बीच थानेदार और उसकी बेटी इस दुनिया से रुखसत हो चुके थे। नौकरों की अब कोई आवश्यकता नहीं थी। सुक्खा अब इस घर का अकेला मालिक था, परन्तु वह हमेशा अपने घर में कैद रहता था, उसकी इस हालत के चलते आसपड़ोस के लोग उससे घबराने भी लगे थे और पीठ पीछे उसे सब अब 'पगला सुक्खा' के नाम से ही सम्बोधित करने लगे  थे।

                                   
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बरसों बीत गए, फिर एक दिन पगले सुक्खे के पड़ोस में एक नया परिवार आ कर बसा। पिछली सभी घटनाओं से अपरिचित प्रताप सिंह का यह परिवार अपने सभी नाते-रिश्तेदारों के साथ नए घर की इस ख़ुशी को बाँटना चाहता था। नए घर के गृह-प्रवेश के अवसर पर उन्होंने मोहल्ले के अन्य परिवारों के साथ साथ पगले सुक्खे के घर भी न्यौता दिया।

नियत दिन, सभी कार्य सुख-शान्ति से निपट गए। धीरे धीरे सभी जान-पहचान वाले और रिश्तेदार विदा हो गए।  पागल सुक्खा कभी किसी के घर नही आता जाता था। परन्तु आज अचानक ही वह, सभी के जाने के बाद आ टपका। फूलों का एक गुलदस्ता हाथ में लिए उसने दरवाजे की घण्टी बजाई। दरवाजा खोलने प्रताप सिंह की बेटी निक्की आई। जैसे ही उसने दरवाजा खोला, दरवाजे पर खड़े पागल सुक्खे के वो दिल में घर कर गई।

अधिक देर वह रुका नही, परन्तु जाते जाते प्रताप सिंह को कह गया कि वह निक्की से शादी करना चाहता है।

भौंचक और आहत प्रताप सिंह ने जब इस बारे में पड़ोसियों से चर्चा की तो उन्होंने सर पीट लिया ! किस मनहूस घड़ी में प्रताप सिंह ने पगले सुक्खे को न्योता दे दिया था, बिना किसी से कुछ भी पूछे ! अब उसकी इस बात का क्या अर्थ था, कोई नही जानता था !



पागल सुक्खे की चाहत, निक्की को पाने की बढ़ती जा रही थी। परन्तु इस सब से अनजान निक्की पड़ोस के ही एक लड़के कँवल से प्यार करने लगी थी। इतने पड़ोस में दोनों ही परिवारों में से कोई भी उनकी शादी के लिए रज़ामंद नही होगा, इस वजह से वो दोनों एक दिन घर से भाग गए। मुहल्ले में इस बात की चर्चा थी ही, प्रताप सिंह और कँवल के पिता रूप सिंह के लिए भी यह अप्रिय और जगहंसाई वाली स्थिति थी। अतः दोनों ही परिवार आपस में मिले और नियत किया गया कि अब बेहतर यही रहेगा कि दोनों बच्चों को किसी भी प्रकार से वापिस बुला इस सम्बन्ध को सामाजिक मान्यता दे दी जाये।

जब परिवार वालों की स्वीकृति की बात कँवल और निक्की तक पहुँची, तो वो भी अंततः घर लौट आये। सभी की स्वीकृति से धार्मिक कर्मकाण्डों के बाद एक प्रीतिभोज देना नियत हुआ, जिससे चल रही सभी चर्चाओं को विराम दिया जा सके।

प्रीतिभोज की रात, उत्सव गार्डन में, लोगों का आना जाना शुरू हो चुका था। तरह तरह के व्यंजनों की खुशबू पूरे वातावरण में समाई हुई थी। गार्डन के एक किनारे पर बने हुए कमरे में, निक्की-कँवल अपने अपने माता-पिता और कुछ अत्यंत नज़दीकी रिश्तेदारों के साथ लान में अपने लिए लगे हुए स्टेज पर प्रवेश की प्रतीक्षा में ही थे कि एकाएक ही कमरे में बाँसुरी की धुन गूँजने लगी।

हैरान हो, उन सभी ने इधर-उधर देखना शुरू किया ही था कि कमरे में सड़े हुए माँस की बदबू भरनी शुरू हो गई। एक असहनीय दुर्गन्ध ! साथ ही सड़े-गलेे फल-फूल-पत्तियाँ जाने कहाँ कहाँ से बरसने लगे ! हैरान परेशान और भयभीत सभी परिजन अपनी जगहों पर यन्त्रवत से चिपके हुए खड़े रह गए। कुछ ही क्षणों उपरान्त नाचते-गाते हुए विचित्र से प्राणियों का दल कमरे में प्रवेश कर गया। सड़े हुए माँस की गंध उन्ही से आ रही थी, फूल-पत्ते भी वही फेंक रहे थे।

कमरे में आते ही उन्होंने उस जगह रखे हुए  सभी सामान को उठा उठा कर हवा में उछालना शुरू कर दिया। पूरा कमरा डरावनी आवाजों के चीत्कार से भर उठा। फिर अचानक ही, कमरे में बाँसुरी की वही धुन सुनाई देने लगी, जो लोगों को पागल सुक्खे के घर से आती हुई सुनाई देती थी।

अचानक ही सब कुछ एकदम शाँत हो गया। एकदम कब्रिस्तान की खामोशी ने पूरे कमरे को अपने आगोश में ले लिया। एक पल के बाद, एक बार फिर बाँसुरी बजने लगी। अगले ही क्षण पागल सुक्खे ने बाँसुरी बजाते हुए कमरे में प्रवेश किया। उसकी आँखे लाल अंगारों की तरह दहक रही थी। चेहरे पर वितृष्णा के भाव थे। कमरे में उसके प्रवेश करते ही उन जिन्नों ने कँवल को गर्दन से पकड़ पागल सुक्खे के सामने ला खड़ा किया।

अपने सामने खड़े कँवल को देख कर भी, पागल सुक्खा उसी प्रकार नफरत भरे अँदाज में बाँसुरी बजाता रहा। फिर एकाएक, उसका एक हाथ हवा में उठा। कमरे में मौजूद लोगों ने देखा कि उसके हाथ में चाँदी की मूठ वाला लपलपाता हुआ एक खंज़र था। इससे पहले कि अवाक् हुए चेहरे कुछ समझ पाते, लहराता हुआ खंज़र कँवल की गर्दन पर खून की एक लकीर छोड़ता हुआ निकल गया। तड़फता हुआ कँवल एकदम से नीचे गिरा, उसकी गर्दन से अब तक खून का फव्वारा उबलने लगा था। कुछ पल उसके जिस्म ने हरकत की  और फिर सब कुछ शाँत हो गया।

अपनी आँखों के सामने ही कँवल को यूँ मृत देख बदहवाश निक्की के कण्ठ से भयाक्रांत हो एक चीख निकली और वो अपनी जगह पर ही गिर बेहोश हो गई।
उन जिन्नातों ने एक बार फिर नाचना शुरू कर दिया। एक जिन्न ने बेहोश निक्की को अपने कन्धे पर लादा, और फिर पागल सुक्खे के साथ ही, जिस प्रकार वो सब आये थे, वैसे ही अपने पीछे तबाही का एक मन्ज़र छोड़ नाचते हुए बाहर निकल गए।

मूर्छित सी अवस्था में अपनी ही जगहों पर जड़वत खड़े लोगों को जब होश आया तो उनके सामने खून से लथपथ कँवल की लाश थी, और निक्की गायब थी। तुरन्त-फुरन्त सब बाहर की तरफ भागे। परन्तु बाहर सब कुछ वैसा ही था, जैसा कि शादियों की दावतों में होता है ! लोग बातें कर रहे थे, खा पी रहे थे। स्टेज के एक किनारे पर जमा हुआ आर्केस्ट्रा फ़िल्मी गाने बजा रहा था ! कुछ ही क्षण पहले, क्या दुर्घटना हुई है, इससे बेखबर वो सब अपनी हँसी-ठिठोली में मशग़ूल थे।

लुटे-पिटे दोनों परिवारों ने पुलिस को बुलवाया। रात भर टार्चों से पूरे क्षेत्र को छान मारा, पर कुछ नही मिला। सुबह होते ही पागल सुक्खे के घर पर छापा मारा गया। वहाँ अज़ब सी दुर्गन्ध ने उनका स्वागत किया। यहाँ तहाँ बहुत सी हड्डियाँ, तन्त्र मन्त्र में इस्तेमाल किया जाने वाला सामान तो इधर उधर बिखरा पड़ा मिला परन्तु निक्की या पागल सुक्खे का कोई नामोनिशान नही था।

रोते कलपते दोनों परिवारों के परिजन वापिस लौट आये।इससे ज्यादा कुछ उनके बस में था भी नहीं।

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इस घटना को लोग धीरे धीरे भूलना भी शुरू हो गए। थानेदार की बैरक आज भी वीरान और उजाड़ पड़ी थी। परन्तु, अब इतना अवश्य था कि सुक्खे पागल के न होने तथा वहाँ से पुलिस व अन्य लोगों के सुऱक्षित वापिस बाहर आ जाने से हम बच्चों पर उस बैरक का जो डर समय हुआ था, वो अब जाता रहा था। अब, कभी कोई गेंद चारदीवारी के अंदर चले जाने पर हम बाकायदा  गेट खोल कर जाते थे, और अपनी गेंद ढूँढ कर ही लौटते थे।

पर फिर एक रात, जब आसमाँ सदा की तरह काला ही था । अचानक से प्रताप सिंह के घर का दरवाजा बुरी तरह से थरथरा उठा। बाहर की तरफ से उसे कोई बेतहाशा जोर जोर से पीट रहा था। तुरन्त ही प्रताप सिंह ने दरवाजा खोला, तो सामने का दृश्य देख उसके पाँव तले जमीन ही खिसक गई !

सामने बुरी तरह से लहूलुहान और चिथरों में लिपटी निक्की खड़ी थी। डर और घबराहट के चलते उसकी आँखे जैसे बाहर की तरफ उबली पड़ी थीं।
तुरन्त ही प्रताप सिंह उसे भीतर ले आया। तब तक परिवार के बाकी सदस्य भी आ चुके थे।

अपने दोनों हाथ जोड़, निक्की ने कुछ कहने का प्रयास किया, पर असफल रही। प्रताप सिंह ने गौर किया उसकी आधी जुबान काट दी गई थी। इशारों से निक्की ने भी इस बात को समझाने का प्रयास किया और फिर अपने कपड़ों की भीतरी सतह से लहू से लिपटा हुआ एक खंज़र बाहर निकाला।

प्रताप सिंह और सभी उपस्थित जन चाँदी की मूठ वाले उस खंज़र को देखते ही पहचान गए। यह वही खंज़र था जो उस रात सुक्खे पागल के हाथ में था।

एक बार फिर, निक्की ने इशारों से समझाने का प्रयत्न किया कि इस खंज़र से उसने सुक्खे पागल का काम तमाम कर दिया है।

सवाल बहुत से थे, पर पूछे किससे जाते ? निक्की तो खून से सनी हुई एक बदहवाश हँसी हसती ही जा रही थी, जैसे उसे पागलपन का कोई दौरा पड़ गया हो ।  फिर अचानक से वो एक कटे हुए पेड़ की तरह भरभरा कर गिरी, और गिरते ही उसके प्राण पखेरू उड़ गए।

बस, जैसे किसी प्रकार उसने साथ छोड़ते हुए प्राणों को थाम रखा था कि वह अपने परिवार वालों को इतना भर बता सके कि उसकी ज़िन्दगी उजाड़ने वाला भी अब इस दुनिया में ज़िंदा नही बचा।


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