Monday, 21 December 2015

भारत देश के सबसे प्रथम घुम्मकड को मेरा प्रणाम


जैसी मेरी तबियत है एक आज़ाद घुमक्कड़ की कुछ वैसी ही फितरत बाबा नानक की भी थी | उनका व्यक्तित्व कुछ इस तरह से बहुआयामी था कि आप उनका जीवन वृत्तांत पढ़ते हुए उसमे एक आदर्श पुत्र, भाई, शिष्य, पति तथा पिता के रूपों के साथ साथ एक धार्मिक प्रचारक, एक गुरु, एक सूफी, एक समाजसुधारक, एक बेहतरीन काव्य शास्त्र का ज्ञाता  और एक विलक्षण घुमक्कड़ की छवि पाते हैं| अपनी इस जीवन यात्रा में वह इतना घूमे कि आज सैंकड़ों वर्षों पश्चात भी हम उनके द्वारा विचरित सही सही स्थानों को चिन्हित नहीं कर पाए हैं | आज भी दुनिया भर में कई स्थान ऐसे हैं जिनके बारे में यह दावा किया जाता है कि गुरु नानक अपने देशाटन के दौरान उन जगहों पर गए थे, परन्तु उन सभी जगहों को अभी एतिहासिक कसौटीयों पर कसना बाकी है | अत: स्वाभाविक है कि इस blog पर अपनी पहली पोस्ट मुझे ऐसी ही एक शक्शियत को समर्पित करणी चाहिए जो सिख धर्म के प्रवर्तक तथा प्रथम गुरु होने के साथ साथ सही अर्थों में एक समाजसुधारक तथा समाज के पथ प्रदशक भी थे.......
  

"सुणी पुकार दातार प्रभ, गुर नानक जग माहि पठाया।"
                                                                      -भाई गुरदास


साल 1400 के आसपास का समय था, और देश में मुगल सल्तनत का साम्राज्य। आम जनता सदा की ही तरह दुखी और असहाय थी। जब सैनिक और राजनैतिक तौर पर सत्ता को चुनौती देने के हालात नही होते अथवा अभी वो समय इतना परिपक्व नही हुआ होता कि कोई एक ऐसा सशक्त नेतृत्व उभर सके जो एक स्थापित सत्ता से लोहा ले सके तो धर्मभीरु लोग अक्सर ही धर्म की शरण में जाते हैं क्यूँकि बुरी तरह से निराश और हर तरफ से ठुकराए हुए लोगों की अंतिम शरण स्थली वही होती है। परन्तु उस दौर में हिन्दू धर्म भी छुआ छूत, वर्ण व्यवस्था और धार्मिक कुरीतियों के मकड़ जाल में कुछ इस कदर उलझा हुआ था कि एक व्यापक और समग्र तौर पर वो भी समाज के सभी दबे कुचले और निःसहाय लोगों की एक सशक्त आवाज बन कर उभर न सका।
परिस्थितियाँ ही कारक होती हैं किसी भी नवीनता के सृजन की, और यहाँ भी इन्ही परिस्थितियों ने एक उत्प्रेरक का कार्य किया जब समाज के आम वर्ग के बीच में से ही कुछ ऐसे व्यक्ति निकले जिन्होंने  धार्मिक ग्रंथो में लिखी रूढ़ और आम जन के लिए वर्जित श्लोकों से परे हट साधारण लोगों की बोली, बिम्बो, प्रतीकों और रूपकों का प्रयोग कर धर्म के एक आसान और सहज स्वीकार्य रूप को आम जन के सामने प्रस्तुत करने का साहस किया, जिससे भारतीय समाज में एक नई धारा, भक्ति आंदोलन का प्रवाह शुरू हुआ।
रोचक बात यह है कि ऐसा बदलाव केवल उत्तर भारत में ही नही हो रहा था, पश्चिम से लेकर दक्षिण भारत भी कुछ ऐसी ही मनोस्थिति से गुजर रहा था। और ऐसा भी नही कि केवल हिन्दुस्तान या फिर इसमें जन्मे धर्मों में यह लहर थी, अपितु सुदूर अरब में जन्मे इस्लाम तक में सूफ़िज़्म के रूप में एक सहज और ग्राह्य धारा बह निकली थी, जो कि इस्लाम में व्याप्त कट्टरता से अलग थी और भारतीय संस्कृति और दर्शन के अधिक समीप थी।

अब, आज अगर हम अपने आप को सिर्फ उत्तर भारत तक ही सीमित रखें तो यहाँ भक्ति आंदोलन में दो प्रमुख्य धाराएं थी - निर्गुण और सर्गुण। सर्गुण के प्रवर्तक तुलसी और सूरदास अधिक चर्चित हुए, जिन्होंने क्रमशः राम और कृष्ण की जीवन लीलाओं को आम जन की भाषा में कविता रूप में लोकप्रिय करने का कार्य किया वहीँ निर्गुण में बाबा नानक और कबीर ऐसे दो प्रमुख्य नाम रहे जिन्होंने किसी एक नायक को ईश्वर का प्रतीक बनाने की जगह बिना नाम, चेहरे और पहचान वाली एक सर्वशक्तिमान सत्ता को स्थापित किया जो उपस्थित है भी और नही भी, जिसे देखा भी जा सकता है और नही भी, जिससे आप बात कर भी सकते हो और नही भी, जिससे लड़ झगड़ भी सकते हो और नही भी, जिसे उलाहना भी दे सकते हैं, मौजूदा हालातों के लिए ताना भी मार सकते हैं और तन्ज़ भी कस सकते हैं और नही भी... उसे पिता के रूप में भी मान सकते हैं और प्रेमी के भी...
अपनी दृष्टि को यदि और संकुचित करते हुए यदि आज के इस अवसर पर इस दिन को महत्व देते हुए तथा बाबा नानक के प्रकाश उत्सव पर इसे केवल उन्ही तक सीमित रखे तो उस समय के हिन्दू धर्म में व्याप्त कुरीतियों को दूर करते हुए उन्होंने एक ऐसे सरल और आसान दर्शन की व्याख्या की जिसे हम उन्हें सिख धर्म का सूफ़ी भी कह सकते हैं क्यूँकि इसमें व्याप्त सूफ़िज़्म की छवि उनकी ही रचनाओं के प्रभाव के कारण है।
बाबा नानक, जिनका सन् 1465 में ननकाना साहिब(आज यह जगह पाकिस्तान में है) में मेहता कालू और माता तृप्ता के घर जन्म हुआ, कार्तिक मास की पूर्णिमा को उनका जन्मोत्सव दुनिया भर में बहुत श्रद्धा और जोशोखरोश के साथ मनाया जाता है।
हिन्दुस्तान उत्सव प्रधान और रचनाधर्मिता पूर्ण समाज है अतः हर कोई अपने हिसाब से उत्सव मनाने का मौका खोज लेता है, परन्तु यदि मैं अपनी बात करूँ तो मुझे गुरु नानक की शख्शियत में जो एक घुम्मकड़, मस्तमौला परन्तु रूहानी फ़क़ीर है, वही मेरी सहज पसन्द है। उनके द्वारा यदि घूमे गए स्थानों की एक सूची पर नज़र भर ही मार ली जाए तो एक गुरु के साथ साथ उन्हें एक विलक्षण घुम्मकड़ भी सहज ही माना जा सकता है।
क्या आप यह विश्वास कर सकते हैं कि एक ऐसे दौर में जब आवागमन के साधन सहज उपलब्ध नही थे उन्होंने अपने जीवन काल में चार प्रमुख्य यात्राएं की, जिन्हें उदासी के नाम से जाना जाता है। उनकी यह यात्राये लगभग 35 वर्षों में सम्पूर्ण हुई और उन्होंने इसमें अपने दो अनन्य सहयोगियों भाई बाला और भाई मरदाना के साथ अनुमानतः 30,000 मील से अधिक यानि तकरीबन 50,000 किमी की दूरी तय की। उस समय की दुर्गम परिस्थितियों को देखते हुए इसे आश्चर्यजनक ही माना जाएगा क्यूँकि इसमें से अधिकतर दूरी उन्होंने पैदल ही की और साथ ही साथ, गाँव दर गाँव, शहर दर शहर लोगों से मिलते जुलते हुए और अपने सिद्धांत से जोड़ते हुए की। हिन्दू धर्म के सभी प्रमुख तीर्थस्थानों के अतिरिक्त, उन्होंने अन्यानेक यथासम्भव अन्य दूसरे स्थानों की भी यात्रा की और अपने इस नए नवेले धर्म को सदूर कोने कोने तक फैलाया।
अपनी पहली यात्रा जो सन् 1500 से 1506 तक चली, जिसमें उन्होंने  सुल्तानपुर(वर्तमान में पाकिस्तान में ) से होते हुए टुलम्बा, पानीपत, बनारस, नानकमत्ता(नैनीताल के समीप) कामरूप(आसाम), सैदपुर और सियालकोट( वर्तमान पाकिस्तान में) जैसी जगहों का भ्रमण किया और इन जगहों पर अपने सन्देश को सन्देश को फैलाया।
दूसरी यात्रा में उन्होंने, जो मुख्यतः 1506 से 1513 तक चली धनासरी घाटी से लेकर आज के श्रीलंका की यात्रा की।
तीसरी यात्रा जो 1514 से 1518 तक चली, इसमे कश्मीर, सुमेर पर्वत, नेपाल, ताशकन्द, सिक्किम, तिब्बत आदि की यात्रा की, हालाँकि कुछ इतिहासविद्व इसमें चीन को भी जोड़ते हैं, पर मैं उसे इसलिए शामिल नही कर रहा क्यूँकि अभी स्वतंत्र खोजियों द्वारा इसकी पुष्टि होना बाकी है।
अपनी चौथी और अंतिम प्रमुख्य यात्रा जो 1519 से1521 तक चली, इसमें उन्होंने  इराक, मक्का, तुर्की, और दूसरे अरब देशों का रुख किया। हालांकि सीरिया में एक मस्जिद है जिसे वली हिन्द की मस्जिद के नाम से जाना जाता है, यदि इसे भी शामिल किया जाए तो उनकी यात्रा अफ़्रीकी महाद्वीप तक निकल जाती है, परन्तु अभी इसका भी स्वतंत्र अन्वेषी दलों द्वारा मूल्याँकन किया जा रहा है, तो फिलहाल इसे हम शामिल नही करते।
परन्तु जो तथ्य निर्विवाद हैं और सत्यापित हैं वो भी अपने आप में कमाल हैं और बाबा नानक और उनके सहयोगियों की अदम्य इच्छशक्ति और साहस को प्रकट करते हैं।
समय के साथ साथ और किसी धर्म को संस्थागत रूप से तेजी से फैलाने के लिए अक्सर ही प्रचारक झूठे सच्चे किस्सों का समावेश कर जाते हैं, जिससे श्रदालु तो जरूर रोमांचित होते हैं परन्तु इससे धर्म और उसके प्रवर्तक का मानवीय पक्ष गौण होकर एक आलोकिक और चमत्कारिक रूप सामने आ जाता है, जो व्यक्ति पूजा, ढकोसलों और एक अलग प्रकार के कर्म कांडों को जन्म देता है। जबकि बाबा नानक की वाणी और उपदेश ऐसे ही चाहे कोई व्यक्ति किसी भी धर्म को माने अथवा न भी माने, वो उनकी व्यवहारिकता से जरूर प्रभावित होता है।
जो मुख्य 3 उसूल गुरु नानक ने सिख धर्म को दिए, जिसकी पालना करना हर सिख के लिए आवश्यक है, वो निम्नांकित है-
1. किरत(कर्म) करना ( Do ur work with honesty)
2. नाम सिमरन (Pray to God)
3. वंड छकना (Serve to the needy)
अब यह ऐसे बुनियादी उसूल हैं जिनका पहले से ही स्थापित किसी भी अन्य धर्म के साथ कोई मतभेद नही हो सकता। इसी प्रकार गुरु नानक ने सिख धर्म का जो मूल मन्त्र दिया, जो उनकी सबसे पहली शिक्षा है और जिससे गुरु ग्रन्थ साहिब की शुरुआत होती है, वो भी सर्वमान्य है और सभी धर्म अलग अलग रूपों में इसे मानते हैं।

ੴ ਸਤਿਨਾਮੁ ਕਰਤਾਪੁਰਖੁ ਨਿਰਭਉ ਨਿਰਵੈਰੁ ਅਕਾਲ ਮੂਰਤਿ ਅਜੂਨੀਸੈਭੰ ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
(ੴ) इक्कओन्कार  - God is one
सतनाम - His name is Truth
करतापुरख - He is the creator of the universe
निरभऊ - He does not fear
निरवैर- He does not have anonymity with any body
अकालमूरत - He does not have a shape
अजूनी- He is far away from the cycle of birth and death
सैभं - He is omnipresent and born by Himself
गुरप्रसाद - One can find him with the blessings of true guru( mentor)
गुरु नानक द्वारा रचित सभी शब्द गुरु ग्रन्थ साहिब में संकलित है, सभी काव्यात्मक रूप में है और अनेक रागों के अनुसार वर्गीकृत है।
ऐसे बा-कमाल और अद्धभुत शख्शियत के धनी, गुरु नानक का आज आगमन दिवस है, जिसे दुनिया भर में सिख धर्म के लोग गुरुपुर्व के रूप में मनाते हैं। और यूँ भी, समय समय पर धरती पर कुछ ऐसे पीर पैगम्बर आते रहे हैं जो कि किसी एक धर्म, समुदाय के न हो कर पूरी मानवता के हो जाते हैं, उनके उपदेश देश काल और समाज के बन्धनों से परे सबके लिए है, और निश्चित रूप से गुरु नानक का व्यक्तित्व सरब साँझे पीर वाला ही है।
इस अवसर पर मैं आपको गुरु नानक की ही एक रचना, माधो हम ऐसे तू ऐसा... का लिंक दे रहा हूँ, जिसे आप समय निकाल कर जरूर सुने, इसमें कोई धार्मिकता नही, और इसे उस्ताद शफ़्फ़ाक़त अली खान ने बहुत तन्मयता से गाया है, यदि आप अच्छे संगीत के पारखी हैं तो आप को अवश्य ही पसन्द आएगा, ऐसा मेरा विश्वास है।


https://www.youtube.com/watch?v=Ys54AgrG2TE
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